सोमवार, 19 जनवरी 2026

अवसाद का आनंद - सत्यदेव त्रिपाठी

 

"अवसाद का आनंद"
सत्यदेव त्रिपाठी

जयशंकर प्रसाद हिंदी साहित्य के लिए जितना कर सकते थे अधिकतम किया. कविता, कहानी, उपन्यास, और नाटक के क्षेत्रों में उनका काम कालजयी है. ऐसे केन्द्रीय व्यक्तित्व पर हिंदी में ढंग से जीवनी भी नहीं लिखी गयी है. इधर रज़ा फाउंडेशन की सहायता से सत्यदेव त्रिपाठी ने उनकी जीवनी ‘अवसाद का आनंद’ शीर्षक से लिखी है. यह उस कमी को पूरा तो करती है लेकिन अभी भी उनके क़द को देखते हुए और जीवनियाँ लिखी जानी चाहिए. प्रसाद पर इधर के वर्षों में कुछ ऐसे कार्य सामने आएं हैं जो उनको देखने की अलग दृष्टि प्रदान करते हैं. इनमें वरिष्ठ आलोचक विजय बहादुर सिंह की पुस्तक ‘जातीय अस्मिता के प्रश्न और जयशंकर प्रसाद’ महत्वपूर्ण है जो प्रसाद की सांस्कृतिक अस्मिता की गहन पड़ताल करती है. श्याम बिहारी श्यामल ने प्रसाद के युग और जीवन पर केन्द्रित उपन्यास लिखा है- ‘कंथा’ जो उनके विराट व्यक्तित्व का आभास देती है. एक महत्वपूर्ण कार्य ‘संवाद’ प्रकाशन के यशस्वी कर्ताधर्ता आलोक श्रीवास्तव ने किया है. प्रसाद पर दो खंडो में ‘स्वप्नलोक में आज जागरण’ तथा ‘नील लोहित ज्वाला जीवन की’ लिखकर और छापकर. प्रसाद की कामयानी की ऐसी विशद विवेचना दुर्लभ है. ‘अवसाद का आनंद’ की चर्चा कर रहें हैं 

कवि-लेखक बोधिसत्व

मुझे जिस बात ने सबसे अधिक आकर्षित किया वह है प्रसाद के साहित्य से सूत्रों से प्रसाद के जीवन के तार बुनने का काव्यात्मक यत्न. जीवन को वर्ष क्रम में देखने की जगह लेखक सत्यदेव त्रिपाठी जी ने उसे साहित्य-सृजन क्रम में रचा है और यही बात इस जीवनी को पीछे के जीवनी साहित्य से अलग भी करती है और उच्चता भी प्रदान करती है. साहित्य-सृजन क्रम कहने का यह अर्थ न निकाल लिया जाए कि किताब प्रसाद के साहित्यकार होने के समय से उनका जीवन दिखाती है. ऐसा नहीं है. जितनी सूचना कुल-खानदान, पिता पूर्वजों के बारे में और उनकी सामाजिकता के बारे में जरूरी है वह इस किताब में यथा स्थान दर्ज है. इसके लिए जीवनीकार ने यथावश्यक श्रम और यत्न दोनों किये हैं.




  कंथा  (जयशंकर प्रसाद के जीवन और युग पर केंद्रित उपन्यास) लेखक: श्याम बिहारी श्यामल