"अवसाद का आनंद"
सत्यदेव त्रिपाठी

जयशंकर प्रसाद हिंदी साहित्य के लिए जितना कर सकते थे अधिकतम किया. कविता, कहानी, उपन्यास, और नाटक के क्षेत्रों में उनका काम कालजयी है. ऐसे केन्द्रीय व्यक्तित्व पर हिंदी में ढंग से जीवनी भी नहीं लिखी गयी है. इधर रज़ा फाउंडेशन की सहायता से सत्यदेव त्रिपाठी ने उनकी जीवनी ‘अवसाद का आनंद’ शीर्षक से लिखी है. यह उस कमी को पूरा तो करती है लेकिन अभी भी उनके क़द को देखते हुए और जीवनियाँ लिखी जानी चाहिए. प्रसाद पर इधर के वर्षों में कुछ ऐसे कार्य सामने आएं हैं जो उनको देखने की अलग दृष्टि प्रदान करते हैं. इनमें वरिष्ठ आलोचक विजय बहादुर सिंह की पुस्तक ‘जातीय अस्मिता के प्रश्न और जयशंकर प्रसाद’ महत्वपूर्ण है जो प्रसाद की सांस्कृतिक अस्मिता की गहन पड़ताल करती है. श्याम बिहारी श्यामल ने प्रसाद के युग और जीवन पर केन्द्रित उपन्यास लिखा है- ‘कंथा’ जो उनके विराट व्यक्तित्व का आभास देती है. एक महत्वपूर्ण कार्य ‘संवाद’ प्रकाशन के यशस्वी कर्ताधर्ता आलोक श्रीवास्तव ने किया है. प्रसाद पर दो खंडो में ‘स्वप्नलोक में आज जागरण’ तथा ‘नील लोहित ज्वाला जीवन की’ लिखकर और छापकर. प्रसाद की कामयानी की ऐसी विशद विवेचना दुर्लभ है. ‘अवसाद का आनंद’ की चर्चा कर रहें हैंकवि-लेखक बोधिसत्व

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